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एक अपील

ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नही...

Sunday, 28 December 2014

ख़ामोशी

किसी ने मुझसे कहा क्यों खामोश है इतना भुप्पी
अब तोड़ भी दे अपनी चुप्पी
मैंने कहा लोकतंत्र की हत्या देख रहा हूँ
उसके पुनर्जन्म की बाट जोह रहा हूँ
क्या गीता में श्रीकृष्ण की बात झूठी हो गई
अधर्म ही यहाँ रीति हो गई
खामोश हूँ मुझे खामोश ही रहने दो
बहुत की बोलने की कोशिश अब मुझे चुप रहने दो

उसने कहा याद कर इतने दिनों तक तु लड़ा
अब क्यों है चुपचाप खड़ा
इतने दिनों की तेरी मेहनत जायेगी व्यर्थ
ऐसा ना कर तु अनर्थ
मैंने कहा बात तुम्हारी सच्ची है
सोचने पर जचती है
तन के दुःख को बड़ा मान लिया
अब अपनी असलियत पहचान लिया
दौड़ दौड़ के गया था थक
छोटी मुश्किलों में ही गया था अटक
अब फिर से मुझको लड़ना है
अपनी किस्मत खुद गढ़ना है 

3 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-12-2014) को पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आभार शास्त्री जी

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  3. सुन्दर प्रस्तुति

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