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एक अपील

ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नही...

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Friday, 24 April 2015

सियासी साजिशें

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इन सियासत के गलियारों ने,
इंसानों को बाँट दिया
इनकी सियासी साजिशों ने
इंसानियत का गला काट दिया

सियासी साजिशों की
बहुत गहरी है जड़े
धरती के कई कोनों में
अभी भी बिखरी है धड़े

मौत के खेल की
कैसी है ये आजमाइश
धरती को लाल देखने की
जैसे किसी ने की हो फरमाइश

महज एक सियासी जीत के लिए
बलि चढ़ गई हजारों की
नफरत की दीवार खड़ी हो गई
दो इंसानों के बीच पहाड़ों सी

डरता हूँ नफरत की आग
कहीं इतनी ना फ़ैल जाय
इंसानियत तो निगल ही रहा
कही दुनिया ना निगल जाय 

Sunday, 10 November 2013

दिल्ली मै आ रहा हूँ

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दिल्ली तेरी गलियों में फिर शोर होगा
वंदे मातरम की गूंज चहुंओर होगा
कुछ ख्वाब जो अधूरे रह गए थे, पूरा करने जा रहा हूँ
दिल्ली मै आ रहा हूँ, दिल्ली मै आ रहा हूँ

पिछली बार जब हम मिले थे
जागती आँखों से सपना दिखाया था मुझे
उन सपनों को हकीकत में बदलने जा रहा हूँ
दिल्ली मै आ रहा हूँ, दिल्ली मै आ रहा हूँ

तेरी सड़को, तेरी गलियों ने पुकारा है फिर मुझे
यूँ तो भीड़ होती है उस महफ़िल में बहुत
उस भीड़ में एक और इजाफा करने जा रहा हूँ
दिल्ली मै आ रहा हूँ, दिल्ली मै आ रहा हूँ

कुछ अरमान तुझसे मिले बिना पूरी ना होंगी
पर सर्द रहती है अक्सर हवायें तेरी
उन सर्द हवाओं को सहने जा रहा हूँ
दिल्ली मै आ रहा हूँ, दिल्ली मै आ रहा हूँ

Saturday, 9 November 2013

मुर्दों का शहर

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ये मुर्दों का शहर है या बेफिक्रों का,
लोग मिलते है लाशों की तरह,
जबां पे लगा लिए है ताले ,
और पूछते है इतना सन्नाटा क्यों है ?

मेहनत करती है लाशें दिलोजान से,
मेहनताना छीन ले जाता है क़ातिल,
मुफ़लिसी में दिन कटते है लाशों के,
क़ातिल का दिन अय्याशी में गुजरता क्यों है ?

इनको लगता है कि क़ातिल रहते है आसमां में,
उनको जमीं पे लाना है नामुमकिन,
एक पत्थर भी उछाले नहीं है,
और कहते है आसमां इतना ऊँचा क्यों है ?

मै बाशिंदा हूँ उस शहर का,
जहाँ जिंदा कौमें दहाड़ती है,
इंसान के साये को भी पुकारती है,
ये शहर कहता है मुझसे तु इतना बोलता क्यों है ?

Tuesday, 29 October 2013

एक अपील

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ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग
लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश
शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर
पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नहीं रहा उतर

क्या ये मुल्क तेरा नहीं,या तु यहाँ रहता नहीं
दिखा दे आज दुनिया को, जिंदा है तु मुर्दा नहीं
घर के अंदर चीखने से, कुछ भी ना बदल पायेगा
आवाज़ वही खत्म हो जायेगी ,कोई सुन भी ना पायेगा

क्यों रोकता है अपने कदम, है तुझे किसका डर
इस लुट का तो हो रहा, तेरे घर पर भी असर
बुजदिली तुझमे भरी,या मुल्क से प्यार नहीं
इंतज़ार है खुदा का,या गद्दारी में हो शामिल कहीं

हौसलेवालों पर ही बरसती है खुदा की रहमत
एक कदम बढ़ाया ही नहीं, और कोसता है अपनी किस्मत
अगर प्यार है मुल्क से, तो अदा करो इसका नमक
कन्याकुमारी से दिल्ली तक, भर दो पूरा सड़क

Friday, 2 November 2012

दुविधा

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छाया है घना कोहरा
या सुलग रही है कहीं पर आग
ये भीड़ है तमाशा देखने वालों की
या जनता गई है जाग

ये हाथों में तिरंगा लहरानेवाले
वंदे मातरम का नारा लगानेवाले
पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी आया है
या है ये आज़ादी के परवाने

ये बादलों की गड़गड़ाहट है
या जनता रही दहाड़
निकली है भीड़ सैर पर
या फेंकने सिंहासन को उखाड़

यहाँ हर कोई है गुस्से में
या चेहरे की ऐसी ही है बनावट
आए है ये व्यवस्था परिवर्तन के लिए
या थोड़े दिनों की है कसावट  

Monday, 29 October 2012

गुलामी

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गुलामी का दर्द बयां करना है मुश्किल
गुलामी में चैन सुकून सब जाता है छीन
दर्द गुलामी का, पूछो उस परिंदे से
कैद है जो, आज एक छोटे से पिंजरे में

झील और झरने का पानी पीता था जो हरदम
कटोरी में पानी देख घुटता है उसका दम
स्वभाव था उसका डालियों में फुदकने का
आज करता है नाकाम कोशिश सलाखों को कुतरने का

पंख फैलाए उड़ता था, कभी दूर आसमां
अब तो पंख फैलाते ही, खत्म होता है जहां
पर्वत की चोटी पर बैठ, ढलते सूरज को निहारता था कभी
आज तो सूरज की रौशनी ही, नसीब होती है कभी-कभी

पहले मीठे फलों को दूर तक ढूंढने था जाता
अब रुखी सुखी रोटी के संग दिन है बिताता
गुलामी के जंजीरों में, जब से दिन है बिताया
आज़ादी का सही मतलब, उसको समझ आया 

Tuesday, 16 October 2012

लहू की धार बहना अभी बाकी है

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अभी तो केवल आगाज है हुआ, राज़ से पर्दा गिराने का
जाने कितने राज़ का बेपर्दा होना अभी बाकी है

जुल्म और सितम का दौर अभी ठहरा नहीं है
दहकते अंगारों पर चलना अभी बाकी है

रहनुमा का नकाब लिए फिरते थे जो ज़ालिम
उनके चेहरों से नकाब का हटना अभी बाकी है

सिंहासन पर बैठे थे जो मुल्क को अपनी ज़ागीर समझकर
उन ज़ागीरवालों का सिंहासन से उतरना अभी बाकी है

सदियों से लुट रहे है जो वतन, वो अभी जिंदा है
उनको इस हिमाकत का सज़ा मिलना अभी बाकी है

लहू मांगती है जंग ए आज़ादी, धरती के सुर्ख लाल होने तक
अभी तो गिरा है थोड़ा ही लहू, लहू की धार बहना अभी बाकी है

Tuesday, 9 October 2012

कदम बढ़ा तो साथी संग हमारे

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कदम बढ़ा तो साथी संग हमारे
नदियों की धार पलट जायेंगे
क्यों डरता है इन तानाशाहों से
इनके तो तख़्त और ताज उलट जायेंगे

कब तक सहेगा ये जुल्म और सितम
उठा संग हाथ हमारे सितमगर दूर छिटक जायेंगे
लुट रहे है ये सदियों से हमें
इनकी तिजौरियो में हमारे ताले लटक जायेंगे

Sunday, 7 October 2012

शहीदों का दर्द

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छलक आते होंगे आंसू शहीदों के
अपने वतन की हालत देखकर
सोचते होंगे क्यों मर गए हम
इन खुदगर्जो के लिए

सपना जो देखा था शहीदों ने
एक खुशहाल वतन बनाने का
आज बिक रहे है वतनवाले ही
चंद कागज के टुकडों के लिए

दर्द से भर जाता होगा उनका भी दिल
जब जब जमीं पर देखते होंगे
लहू से सींचा था जिस जमीं को
आज उनपर कांटे उगते हुए

ये बात तो उठती होगी उनके भी मन में
कि क्या सोचा था और क्या पाया
सुनहरे भविष्य के लिए दी थी कुर्बानी
अब शहीदों को याद भी किया जाता है तो दिखावे के लिए

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Monday, 17 September 2012

धरती माँ का आह्वाहन (A call of Motherland)

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कर रही आह्वाहन, धरती माँ नौजवानों से
जागो और संघर्ष करो, वतन के इन बेईमानों से

सूरज की गर्मी है तुझमे, तू ही है नदियों की तेज धार
जयचंद बैठे है गद्दी पर, इनको दो तुम उतार

बदलो कि गड़गहड़ाट तुझमे, है तुझमे ही बिजली सी चमक
पुकार रहा है देश तुम्हारा, अदा करो इसका नमक

हो संगठित तुम, एक ताक़तवर मुट्ठी बन जाओ
कोई ना तुम्हे सकता तोड़, ये दुनिया को तुम दिखलाओ

अन्याय अपने चरम पर पहुची, तुम लाचार बने हो क्यों
काँपेगी अन्यायी कि रुंह भी, सुभाष और भगत तो बनो

शोला जो तुम्हारे सीने में भरा, आज उसको दहक जाने दो
क्रांति जो सदियों से है राह देखती, उसे आ जाने दो

गुलामी कि बेडियाँ तोड़, अपने मन को तुम आज़ाद करो
वीरो ने जो दी थी कुर्बानी, उसे यूँही ना बर्बाद करो

हिलेगी तानाशाहों कि गद्दी, तुम्हारे हर हुंकार से
कब तक रहोगे सोये, अब जाग भी जाओ इस ललकार से

आज़ादी का सूरज जो डूब रहा, सूरज बन आसमान में छा जाओ
एक नया सवेरा तुम लाओ, एक नया सवेरा तुम लाओ 

Thursday, 30 August 2012

ये हालात बदलना चाहता हूँ

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बहुत सह लिए अन्याय अब, ये हालात बदलना चाहता हूँ
सरफरोशी जो जागी है अब , ये जवानी वतन के नाम करना चाहता हूँ

कर रहे बेईमान, भारत माँ का आंचल मैला रोज
भागीरथी मै नहीं मगर, हर गांव में गंगा बहाना चाहता हूँ

लुट रहे भारत माँ को, अपने ही वतनवाले रोज
लुटती हुई भारत माँ की, आबरू बचाना चाहता हूँ

जागते इंसान कर रहे यहाँ मुर्दों सा व्यवहार
मुर्दे भी लगाए जयघोष के नारे, ऐसी अलख जगाना चाहता हूँ

अब जो जागा हू तो मै, कुछ कर गुजरना चाहता हूँ
लगी है आग जो मेरे सीने में, सबके सीने में लगाना चाहता हूँ  

है सड़क पर आज हम (We are on the road)

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है सड़क पर आज हम, मांगने हमारा हक
मांग अगर मानी नहीं गई तो, कर देंगे तख्ता पलट

कर रहे ललकार आज, एक सुर और एक ताल में
हिल रही है तानाशाहों कि गद्दी, हमारे हर हुंकार से

हाथो में तिरंगा है और होठो पे वंदे मातरम बसा
झूठे वायदों से हमको, इन्होने हर रोज ठगा

अबकी जो जागे है तो, कुछ कर के ही जायेंगे
हर हैवानियत और जुल्म को, जड़ से मिटायेंगे

क़र्ज़ धरती माँ का जो हम पर है, आज उतारने है आये
बढ़ गए है जो अब ना रुकेंगे, चाहे प्राण निकल जाए 

Tuesday, 7 August 2012

निकली है भीड़ आज लड़ने कुछ गद्दारों से

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काँप रही दीवारे आज जयघोषो के नारों से
निकली है भीड़ आज लड़ने कुछ गद्दारों से

तिरंगा लिए हाथ, टोलियाँ बनाकर
भगत सिंह और सुभाष को दिल में बसाकर
नया भारत बनाने का सपना सजाकर
निकले है बनाने नया इतिहास अपने बलिदानों से

काँप रही दीवारे आज जयघोषो के नारों से
निकली है भीड़ आज लड़ने कुछ गद्दारों से

जनता के कदमो कि आहट सुन कानो से
थर्राता है अब तो दिल सत्ता के दलालो का
समय राह देखता था ऐसे अफसानों का
सिंहासन जब हिलने लगेगी जनता के दहाडो से

काँप रही दीवारे आज जयघोषो के नारों से
निकली है भीड़ आज लड़ने कुछ गद्दारों से

लहू का हर एक कतरा पुकारता है भारत माता कि जय
बढ़े जा रहे है सभी होकर निर्भय
मन में है बस एक ही बात, करनी है दुश्मनों पर विजय
गूंजती है आवाजे आज पहाड़ों से

काँप रही दीवारे आज जयघोषो के नारों से
निकली है भीड़ आज लड़ने कुछ गद्दारों से


देशभक्तों कि गली (Street of Patriots)

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आज चल निकला हू उन गलियों पर
जहाँ जय हिंद और वंदे मातरम का नारा बुलंद होता है
जहाँ देशभक्ति के गीत गाये जाते है
भारत माता में शीश चढ़ाये जाते है

रग रग में बसा होता है देशभक्ति जहाँ
मिलते है जुनूनी लोग यहाँ
जहाँ कटा सिर भी भारत माता कि जय पुकारता है
जहाँ लहू का हर एक कतरा दुश्मन को ललकारता है

हर एक दिल में आग लगी होती है
आज़ादी पाने कि प्यास जगी होती है
यहाँ हर कोई अपने बलिदान को आतुर दिखता है
अपने लहू से इतिहास का पन्ना लिखता है

जहाँ सिर्फ देशभक्ति कि बाते बोली जाती है
हर एक बलिदान को दुश्मनों के कटे सिरों से तोली जाती है
है मकसद जहाँ कि सम्पूर्ण आज़ादी
चाहे देनी पड़े कितनी भी कुर्बानी 

Sunday, 22 July 2012

एक भीड़ निकली है सडको पे आज

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एक भीड़ निकली है सड़कों पे आज
अपना हक जानने, अपना हक मांगने

हर उम्र दराज के लोग है इसमें
है शब्दों में जोश भरा
सदियों बाद जगे है ये
इतिहास के पन्नों में नया पन्ना जोड़ने
एक भीड़ निकली है सड़कों पे आज
अपना हक जानने, अपना हक मांगने

हो गई थी जुल्म कि इन्तहा
रो रोकर बहुत सह लिए
दास्तान-ए-दर्द सुनकर तो रुंह भी कपने लगे
आज खड़े है सड़कों पे अन्याय को जड़ से उखाड़ने
एक भीड़ निकली है सड़कों पे आज
अपना हक जानने, अपना हक मांगने

बिगुल तो फूंक चुके है लड़ाई की
अंजाम तक पहचाना अभी बाकी है
मांग रहे है हर एक दर्द का हिसाब
निकले है ये आज अपना भविष्य सुधारने

एक भीड़ निकली है सड़कों पे आज
अपना हक जानने, अपना हक मांगने

शहीद का परिवार (Family of martyr)

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माँ कि नज़रे टिकी थी राह पर
वीर पुत्र के आने के इंतज़ार में
वो आया भी तो तिरंगे में लिपटकर
माँ के आँखों में आँसू भर गया

बाप के कंधो में खेला बड़ा हुआ
आज बाप के कंधो में ही विदा हो चला
रहेगा याद हमेशा लोगो को वो
लो आज एक और वीर शहीद हो गया

जब तक जिया, जिया वो शान से
आज मरने पे भी, शान में न कमी आई
वीरो कि तरह लड़ा, न झुका, न डरा
अपनी अमरता का, लोगो को सन्देश दे गया

बिलखती माँ पुकार रही है, बेटा तू लौट आ
गहरी नींद में सोया है वो, न आएगा कभी
बावरी हो गई बेवा उसकी, कह रही है
मुझको भी साथ ले जाता, अकेले क्यों चला गया 

Friday, 20 July 2012

एक चिंगारी (A Spark)

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एक चिंगारी उठी है कहीं पे
फैलना चाह रही है बनके आग
मिटाने आयी है दुश्मनों को
कर देगी उनको सुपुर्देखाक

अभी तो उठ रहा है केवल धुआँ
लपटे निकलना तो अभी बाकी है
घासों से निकल रहा है ये धुआँ
सिंहासनो का जलना अभी बाकी है

बरसो बाद उठी है ये चिंगारी
लेके कई बलिदान
बड़ा भयंकर लगेगी  आग
लेके जायेगी कइयो कि जान 

भाग अधर्मी भाग(Run Impious run)

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भाग अधर्मी भाग
जनता के दिलो में लग चुकी है आग

तुने ही लुटा है इनको
तुने ही बांटा है इनको
आखिर कब तक सहते ये अन्याय
मिलाने आ रहे है तुझे खाक
भाग अधर्मी भाग
जनता के दिलो में लग चुकी है आग

गद्दी पे बिठाया तुझको
पर तुने रुलाया सबको
बहुत सह चुके अब
मांगने आ रहे है हर एक दर्द का हिसाब
भाग अधर्मी भाग
जनता के दिलो में लग चुकी है आग

झूठे किये थे तुने वादे
नेक नहीं थे तेरे इरादे
अपनी शक्तियों का किया दुरूपयोग तुने
जनता समझ चुकी है टरइ नियत आज
भाग अधर्मी भाग
जनता के दिलो में लग चुकी है आग 

Tuesday, 17 July 2012

आज़ादी के परवाने (Freedom Lovers)

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आज़ादी के परवाने, किसी से नहीं डरा करते
हो अगर बलिदान का वक्त, तो पीछे नहीं हटा करते
रहता है बस एक ही धुन, मुल्क कि आज़ादी
तोड़ देते है इसके लिए, ये सारे पाबन्दी

जनता पुकारती है इन्हें, कहकर शूरवीर
मिटा देते है दुश्मनों को, जैसे हो कोई लकीर
अपना सर्वस्व कर देते है, वतन पर अर्पण
अपनी अंतिम साँस तक, नहीं करते समर्पण

वीरो तरह ही जीते है, वीरो की तरह ही मरते है
अपनी पूरी जिंदगी, वतन के नाम करते है
घर बार सब त्यागकर, अकेले ही रहते है
अपने लहू से वतन का, रुद्राभिषेक करते है

अपनी हथियार उठा, जब करते है ललकार
दुश्मन थर थर कांपता है, और दिखते है लाचार
वतन पर शहीद होने को, रहते है ये आतुर
ऐसे वीर जवानो का, क्या कर लेंगे ये असुर

Monday, 16 July 2012

भारत माता की जय

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खून का हर एक कतरा पुकार रही है
भारत माता की जय, भारत माता की जय

है दुश्मन बलवान बहुत
धन भी है उसके पास अकूत
अब तो सोचता हू बस यही
कि करना है इनपर विजय

खून का हर एक कतरा पुकार रही है
भारत माता की जय, भारत माता की जय

है साथ मेरे चंद लोग
पर भीड़ बड़ी है उनकी
पुकार रहा है दिल आज ये
बलिदान का आ गया है समय

खून का हर एक कतरा पुकार रही है
भारत माता की जय, भारत माता की जय

है बैरी को अपने ताकत पर घमंड बड़ी
हो गया है तानाशाह वह पूरी
सामना करने को तैयार हू मै खड़ा
अब तो हो चूका हू मै निर्भय

खून का हर एक कतरा पुकार रही है
भारत माता की जय, भारत माता की जय