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एक अपील

ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नही...

Monday, 17 September 2012

यहाँ कागज के टुकडो पर बिकते है लोग (People of here are sold on pieces of paper)

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ये कैसा जमाना आ गया, मै रहा हू सोच
यहाँ कागज के टुकडों पर बिकते है लोग

जनता का सेवक ही, जनता को रहा लुट
धर्म कि बात कौन कहे, यहाँ भाई-भाई में है फुट

डकैती का एक हिस्सा जाता है पहरेदारो को
यहाँ इनाम से नवाज़ा जाता है गद्दारों को

कानून के रखवालों के सामने लुटती है अबलाओ कि अस्मत यहाँ
लुटेरा बना है राजा, उसे है जनता कि फ़िक्र कहाँ

आज भूखा सो रहा सबको खिलानेवाला
एक झोपड़ी के लिए तरस रहा महलों को खड़ा करनेवाला

मंदिर मस्जिद से ज्यादा भीड़ होती है मधुशालाओं में
अब तो फूहड़ता नज़र आती है सभी कलाओं में 

धरती माँ का आह्वाहन (A call of Motherland)

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कर रही आह्वाहन, धरती माँ नौजवानों से
जागो और संघर्ष करो, वतन के इन बेईमानों से

सूरज की गर्मी है तुझमे, तू ही है नदियों की तेज धार
जयचंद बैठे है गद्दी पर, इनको दो तुम उतार

बदलो कि गड़गहड़ाट तुझमे, है तुझमे ही बिजली सी चमक
पुकार रहा है देश तुम्हारा, अदा करो इसका नमक

हो संगठित तुम, एक ताक़तवर मुट्ठी बन जाओ
कोई ना तुम्हे सकता तोड़, ये दुनिया को तुम दिखलाओ

अन्याय अपने चरम पर पहुची, तुम लाचार बने हो क्यों
काँपेगी अन्यायी कि रुंह भी, सुभाष और भगत तो बनो

शोला जो तुम्हारे सीने में भरा, आज उसको दहक जाने दो
क्रांति जो सदियों से है राह देखती, उसे आ जाने दो

गुलामी कि बेडियाँ तोड़, अपने मन को तुम आज़ाद करो
वीरो ने जो दी थी कुर्बानी, उसे यूँही ना बर्बाद करो

हिलेगी तानाशाहों कि गद्दी, तुम्हारे हर हुंकार से
कब तक रहोगे सोये, अब जाग भी जाओ इस ललकार से

आज़ादी का सूरज जो डूब रहा, सूरज बन आसमान में छा जाओ
एक नया सवेरा तुम लाओ, एक नया सवेरा तुम लाओ