Thursday, 4 July 2013

हमारी बहन वर्तमान की झाँसी की रानी, संतोष कोली को समर्पित

कोई रोक ले मेरे आंसुओ को सैलाब बनने से
डरता हूँ अपने हाथ को खून से रंगने से
क़यामत हो जायेगी अगर सीने में छुपी बारूद में आग लग गयी
फिर ना कहना हमें तुम्हारे कमीज में खून की दाग लग गयी

तेरे लहू की हर एक बूंद का हिसाब माँगा जायेगा
तेरे पूछे गये हर सवाल का जवाब माँगा जायेगा
हमने तो सीखा है जीना तुझे देख देखकर
जो तुम ना रही तो फिर सैलाब माँगा जायेगा

जब तुम निकलती थी हाथो में तिरंगा लिए
वंदे मातरम से गूंजती थी सड़के सारी
हजारों को जगाया है तुमने अपनी आवाज़ से
हर दिल में हमेशा बसी रहेगी तेरी बहादुरी



1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शुक्रवार (05-07-2013) को कसरत पर दो ध्यान, बहा मत मात्र पसीना; चर्चा मंच 1297 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'