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एक अपील

ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नही...

Wednesday, 20 March 2013

हमें स्वराज चाहिए

ना दान चाहिए, ना भीख चाहिए
हमें स्वराज चाहिए, हमें स्वराज चाहिए

लोकतंत्र बना आज लूटतंत्र
फूंका हो जैसे किसी ने मन्त्र
रिश्वत का हो गया एक यंत्र
भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहिए

ना दान चाहिए, ना भीख चाहिए
हमें स्वराज चाहिए, हमें स्वराज चाहिए

न्याय के लिए भटकती प्रजा
बेगुनाहों को मिल रही सजा
कोई तो बताये हमारी खता
हमें न्याय का अधिकार चाहिए

ना दान चाहिए, ना भीख चाहिए
हमें स्वराज चाहिए, हमें स्वराज चाहिए

जर्जर सड़क देख दुखता है मन
सालों से अधूरा पाठशाला भवन
पानी बिजली नहीं पहुंची जन जन
हर गांव में हमें विकास चाहिए

ना दान चाहिए, ना भीख चाहिए
हमें स्वराज चाहिए, हमें स्वराज चाहिए


Monday, 11 March 2013

दिल्ली सामूहिक बलात्कार पीड़ित लड़की "दामिनी" को समर्पित

कोई चीखती लबों से , कह गयी बहुत कुछ
कुछ नींद से जागे है, कुछ अनसुना कर गये !

रोती होंगी रुंह भी, जमीं का मंजर देखकर
जो उठे थे हाथ, उनपर भी खंजर चल गये !

आसमां पर बैठ, सोचती होंगी वो दामिनी
इन ज़मींवालो के रगों में, पानी कैसे भर गये ?

आज दिल्ली में लुटेरे, बेख़ौफ़ लुटते है आबरू
पर पहरेदारों की चौकसी, कागजो में क्यों सिमट गये ?

सुन बहन की बिलखती आवाज़, भाई चुप बैठा है क्यों ?
रक्षाबंधन पर किया वादा, वो कैसे भूल गये ?

अब ना जागे सब तो , रुसवा होंगी इंसानियत
दिल की दबी बात, आज कलम कह गये !


Thursday, 13 December 2012

मै आम आदमी हूँ

एक आग लगी सीने में,
सबके सीने में लगाना चाहता हूँ
जागा हूँ मै जो अब तो ,
कुछ कर गुजरने को चाहता हूँ,
मै आम आदमी हूँ, मै आम आदमी हूँ

सौपा जिनको भी राज यहाँ,
उसने ही जमकर लुट मचाया
अब हमारा जीना हो गया है मुश्किल ,
भ्रष्टाचार महंगाई को इतना बढ़ाया
कागज के टुकडों में बिकने वालों को,
जेल के अंदर पहुँचाना चाहता हूँ
मै आम आदमी हूँ, मै आम आदमी हूँ

नहीं होने दी कभी अन्न की कमी मैंने,
सीमाओं पर दुश्मनों से लड़ा
नहीं होता काम बिन हमारे दफ्तरों में,
कारखाने हमारे दमपर है खड़ा
हम पहुंचाते खबर और सन्देश
शिक्षक बन ज्ञान बांटता हूँ
मै आम आदमी हूँ, मै आम आदमी हूँ

सरफरोशी जागी है अब तो ,
ये हालात बदलना चाहता हूँ
बहुत सह लिए अन्याय अब,
बेईमानों का राज बदलना चाहता हूँ
मै आम आदमी हूँ, मै आम आदमी हूँ

Friday, 23 November 2012

शिकायत

उनकी बेखबरी का आलम तो देखो
लगी है भीषण आग उनके शहर में
और वो अपने महलों में बैठ
मधुर तरानों का लुत्फ़ उठा रहे है

रहनुमा बनके फिरते थे हमारी गलियों में
कहते हुए कि हर मुश्किल में साथ निभाऊंगा
आज जब हमारी ज़िंदगी जहन्नुम हो गई
वो कुर्सी पर बैठ मंद मंद मुस्कुरा रहे है

लंबी फेहरिस्त थी उनकी वायदों की
हमारी तंगहाल ज़िंदगी बदलने की बात करते थे
मौका दिया उनको वायदा निभाने की तो
हमको भूल झोलियाँ अपनी भरे जा रहे है

ईद हो या दिवाली संग होते थे हमारे
चेहरे पर मुस्कुराहट और होठों में दुआ रखते थे
अब दर पर जाते है उनके हाल ए ज़िंदगी कहने तो
मिलना तो दूर, हमसे आँखें चुरा रहे है 

Wednesday, 21 November 2012

इसी का नाम ही ज़िंदगी है शायद

बीच मझधार बह रहा हूँ, बिना पतवार के नाव में
ना हमसफ़र है, ना मंजिल का पता
गुमसुम सा, उदास सा, बैठा हूँ इंतज़ार में
कि आए कोई फरिस्ता और मंजिल का पता दे जाये

कभी कभी लगता है, मुझमें जां नहीं है बाकी
पर सर्द हवाएं मेरे जिंदा होने का अहसास करा जाती है
तन्हाई में एक पल भी गुजरता है सदियों की तरह
लहरें तो डराती ही है, अँधेरे का खौफ भी कम नहीं

एक अंजाना डर आँखों से नींद चुरा ले जाती है
जागता हूँ रातों में, जुगुनुओं और तारों के संग
सुबह का उजाला नाउम्मीदगी को करती है थोड़ी कम
पर शाम होते ही उम्मीद का दामन छूट जाता है

इस जलती बुझती उम्मीद की किरण के बीच
अनजाने मंजिल को तलाशना और रास्ता बनाना
डरावने माहौल में थोड़ा सा मुस्कुराना
इसी का नाम ही ज़िंदगी है शायद
इसी का नाम ही ज़िंदगी है शायद 

Monday, 19 November 2012

लकीरें

उस खुदा ने तो नहीं खींची थी लकीरें इस जमीं पर
क्यों खींच ली लकीरें तुने ऐ इंसान ?
ये जानते हुए भी कि मिट्टी में मिलना है सबको
क्यों बना लिए अलग अलग शमशान ?

देश, मजहब और जाति पर तो बाँट ही लिया
पर क्या फिर भी पूरा ना हुआ तेरा अरमान ?
रंग, लिंग, भाषा और बोली के भेद का
बना रहे हो नए नए कीर्तिमान

मतलब के लिए तो टुकडों पर बाँट दिया
क्या सोचा था इसका अंजाम
धूमिल होगी मानवता सारी
और ना रहेगा मोहब्बत का नामोनिशान

तुम कर लो लाख कोशिश मगर
दिलो के मोहब्बत खत्म ना कर पाओगे ऐ नादान
मानवता और नैतिकता तो बनी ही रहेगी
जब तक खत्म ना हो जाए ये जहान

Saturday, 17 November 2012

सवाल सरकार से

एक शख्स बैठ सड़क पर
पूछता है सवाल सरकार से
जिनके दम पर है ये मुल्क सारा
क्यों त्रस्त है वो महंगाई की मार से

क्यों देती है तुम्हारी नीतियाँ
संरक्षण भ्रष्टाचारियों, अत्याचारियों को
क्यों करती है तुम्हारा प्रशासन
नज़रंदाज़ इनकी कारगुजारियों को

किसानों की मौत, मजदूरों के शोषण का
क्या है तुम्हारे पास जवाब
जनता के पैसों की चोरी का
कब दोगे तुम हिसाब

गलत लगते है तुम्हारे
हर दावे और दलीलें ऐ सरकार
समझ चुके है अब हम
तुम्हारी नियत भंली प्रकार 

Friday, 9 November 2012

सवाल

किसने कतरें पर उन परिंदों के
उड़ते थे जो दूर आसमान ?
लहूलुहान दिखती है धरती
किसने दिया ये क़त्ल का फरमान ?

है कौन यहाँ इतना बेरहम
जिसको है खून की प्यास ?
क्यों मिट गया उसके अंदर
दूसरों के दर्द का अहसास ?

तड़पती जानों को देख
कौन यहाँ मज़ा ले रहा है ?
बेगुनाहों को सज़ा ए मौत
कौन यहाँ दे रहा है ?

क्रूरता सहन की सीमा से पार हुई
पर सब खड़े क्यों मौन ?
खून से सनी तलवार जिसकी
पूछते है सब, वो है कौन ?

Tuesday, 6 November 2012

घोटाले

मनमोहन तेरे राज में
और कितने मंत्री होंगे बदनाम ?
बड़े-बड़े घोटालों के अलावा
कुछ भी ना हुआ काम

अपाहिजों की बैशाखी कर चोरी
कानून मंत्री करते है मुंहजोरी
संचार मंत्री ने बेचे सरेआम
अरबों के स्पेक्ट्रम कौडियों के दाम

घाना को हुआ जब चाँवल निर्यात
विदेश मंत्री के रंग गए हाथ
कोयले की कालिख लगी खुद तुझपर
आखिर हम विश्वास करे तो किसपर

जयपाल और जयराम ने चुकाई इमानदारी की कीमत
विभाग बदलकर दे दी उद्योगपतियों को राहत
काँमनवेल्थ में हुआ था जो कबाड़ा
शीला और कलमाड़ी का था एक दूसरे को सहारा

Sunday, 4 November 2012

घोर कलयुग

देखो घोर कलयुग है आया
बड़ी गजब है इसकी माया
दौलत को भगवान बनाया
बिन दौलत अपने भी पराया

दौलत से चलती सरकार
जनता की होती तिरस्कार
मंत्री करता जितना बड़ा भ्रष्टाचार
मिलता उसको उतना बड़ा पुरस्कार

चोर संग पुलिस खाए मलाई
रिपोर्ट दर्ज कराने वाले की होती पिटाई
जेल के अंदर वो है जाता
जो जनता में अलख जगाता

जनसेवकों को मिली रिश्वत की खुली छूट
हरकोई जनता को रहा लुट
बेईमानों का होता सम्मान
ईमानदार सहते अपमान 

Friday, 2 November 2012

दुविधा

छाया है घना कोहरा
या सुलग रही है कहीं पर आग
ये भीड़ है तमाशा देखने वालों की
या जनता गई है जाग

ये हाथों में तिरंगा लहरानेवाले
वंदे मातरम का नारा लगानेवाले
पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी आया है
या है ये आज़ादी के परवाने

ये बादलों की गड़गड़ाहट है
या जनता रही दहाड़
निकली है भीड़ सैर पर
या फेंकने सिंहासन को उखाड़

यहाँ हर कोई है गुस्से में
या चेहरे की ऐसी ही है बनावट
आए है ये व्यवस्था परिवर्तन के लिए
या थोड़े दिनों की है कसावट  

Wednesday, 31 October 2012

दीपावली

दीपों का त्यौहार आया
पूरा देश जगमगाया
ढेरों खुशियाँ संग लाया
मन में उमंग छाया

राम की वापसी हुई थी इस दिन
पूरा हुआ था वनवास कठिन
रावण हरा घर पहुंचे थे राम
लंका जीत किये थे बड़ा काम

घर की होती रंगाई पुताई
चारो ओर दिखती सफाई
एक दूसरे को देते सब बधाई
बंटती रसगुल्ले और मिठाई

सज गए है सारे बाजार
खरीददारों की लगी कतार
फुलझडियों की लगी बहार
पटाखे करते आसमान को उजियार 

Monday, 29 October 2012

गुलामी

गुलामी का दर्द बयां करना है मुश्किल
गुलामी में चैन सुकून सब जाता है छीन
दर्द गुलामी का, पूछो उस परिंदे से
कैद है जो, आज एक छोटे से पिंजरे में

झील और झरने का पानी पीता था जो हरदम
कटोरी में पानी देख घुटता है उसका दम
स्वभाव था उसका डालियों में फुदकने का
आज करता है नाकाम कोशिश सलाखों को कुतरने का

पंख फैलाए उड़ता था, कभी दूर आसमां
अब तो पंख फैलाते ही, खत्म होता है जहां
पर्वत की चोटी पर बैठ, ढलते सूरज को निहारता था कभी
आज तो सूरज की रौशनी ही, नसीब होती है कभी-कभी

पहले मीठे फलों को दूर तक ढूंढने था जाता
अब रुखी सुखी रोटी के संग दिन है बिताता
गुलामी के जंजीरों में, जब से दिन है बिताया
आज़ादी का सही मतलब, उसको समझ आया 

Saturday, 27 October 2012

दशहरा

जिसने किया था सीता का हरण
राम ने मारा था वो रावण
हर साल मर के लेता नया जनम
अब का है ये कैसा रावण

कागज़ के पुतले तो प्रतीक है
हम सब में छिपा बैठा है एक रावण
कागज के पुतले को दहन कर
क्या मार लिया अपने अंदर का रावण ?

बुराई पर अच्छाई की जीत का
त्यौहार है यह दशहरा
पर बुराई मिटने के बजाय
हो रहा और हरा भरा

बुराई तो तब हारेगी
जब हम अपने अंदर के रावण को मारे
आओ हम सब मिलकर बुराई ना करने
और बुराई का ना साथ देने का कसम खा ले 

Tuesday, 23 October 2012

सर्दी का मौसम

सिहर उठता है तन मन
जब चलती है मंद पवन
भाती मन को सूर्यकिरण
कि आया सर्दी का मौसम

हरित तृणों पर ओंस की बुँदे
लगती है मनभावन
सूर्यकिरण पड़ती जब इनपर
जैसे हो तारे करते टिमटिम

जहाँ भी देखो वहाँ दिखे
ऊनी कपड़ों में लिपटा बदन
आग का घेरा डाले है
आज यहाँ पर जन-जन

ठंडे पानी से नहाना
लगता है बहुत कठिन
सुबह जल्दी उठने का
नहीं करता है ये मन 

Sunday, 21 October 2012

सुनामी

याद आता है वो मंजर
जब कहर ढाया था समंदर
लहरों में थी उफान
आ गया था एक तूफ़ान

ऊँची लहरों ने किया प्रवेश
जैसे हो तबाही का श्री गणेश
गाँव हो या शहर
सब पर बरसा कहर

गाँव शहर सब डूबा लिया
मिट्टी में सबको मिला दिया
चली गई हजारों जान
गाँव शहर कर गया शमशान

सुनामी है इस कहर का नाम
बड़ी डरावनी है इसकी पहचान
रुंह तक काँप जाती है
जब जिक्र सुनामी की आती है